बाज़ार का मुक़ाबला सीधा घर से है। इस मुक़ाबले में बाज़ार को हारना ही होगा। जीवन का अगर कोई लक्ष्य है तो वह सिर्फ़ प्रेम ही हो सकता है। समाज हमारी एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारी का नतीजा है। सभी मनुष्य किसी-न-किसी रूप में किसी-न-किसी दूसरे पर निर्भर है ही। यह निर्भरता हमें एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदार बनाती है।
मुझे जब भोजन परोसा जाता है तो यह अनेकों-अनेक जीवित`और मृत लोगों के श्रम से सम्भव हो पाता है। गेहूँ, चावल, सब्ज़ी, दाल अलग-अलग किसानों ने उगाई। फिर किसी ने ट्रकों-ट्रैक्टर में लादा और पास वाली परचून की दुकान तक पहुँचाया। वहाँ से वह रसोई घर तक आई। किसी ने प्राक्रतिक गैस ज़मीन के गर्भ से निकाली और अनेक पेचीदिगियों के बाद सिलेंडर में भरकर घर तक पहुँचाई। किसी ने लोहा और दूसरे खनिज़ ज़मीन से निकाले और स्टील बनाई। फिर उस स्टील से बर्तन बने। किसी ने बर्तन धोए, किसी ने सब्ज़ी काटी, किसी ने खाना पकाया और किसी ने भोजन परोसा।
मैं अक्सर जब भी भोजन करता हूँ तो यह अफ़सोस मन में बना रहता है कि मैं कभी इन सब लोगों का व्यक्तिगत रूप में आभार नहीं व्यक्त कर पाऊँगा। बाज़ार के अनुसार हर वह चीज़ जिसके कारण मेरा भोजन सम्भव हो पाया उसका कुछ मूल्य, कुछ दाम है और एक बार मैंने वह दाम चुका दिया तो मैं सब ज़िम्मेदारी से मुक्त अपना भोजन आनंद के साथ कर सकता हूँ। बाज़ार की यह सांत्वना सुनने में तर्कपूर्ण और मन को बहलाने वाली लगती है पर मन की व्यथा इतने से शांत नहीं होती।
और यह तो सिर्फ़ भोजन की बात हुई। भोजन के अलावा अनेकों ऐसी वस्तुएँ हैं जिन पर मेरा जीवन निर्भर करता है। जैसे की एक मकान, गाड़ी, स्कूटर, बिजली, पानी, फ़र्निचर, कम्प्यूटर, फ़ोन, कलम और काग़ज़। इन सब वस्तुओं के पीछे न जाने कितने मनुष्यों का श्रम समाहित है। तो प्रश्न यह है कि क्या बाज़ार का दाम चुकाकर मैंने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाहन उचित रूप में कर दिया?
इसका जवाब हाँ में नहीं हो सकता। अगर जवाब न है तो मैंने अपनी ज़िम्मेदारी ठीक-ठीक तरह से निर्वहा नहीं की। फिर प्रश्न है कि मैं ऐसा क्या करूँ जिससे मैं अपनी ज़िम्मेदारी निभा सकूँ? आधुनिक समाज इतना जटिल है कि इस प्रश्न का सीधा उत्तर अभी तक मुझे नहीं मिल पाया है।
प्रश्न सिर्फ़ आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक नहीं है, प्रश्न अस्तित्व का है। किसान का अस्तित्व, मज़दूर का अस्तित्व, मालिक का अस्तित्व। क्या मनुष्य का जीवन सिर्फ़ व्यवसाय, सेवा तक सीमित हो सकता है? मनुष्य का जीवन अनंत संभावनाओं की ओर इशारा करता है मगर अधिकतर लोग इन संभावनाओं का अनुभव नहीं कर पाते। समाज के नियमों और बंधनों के कारण मनुष्य अपनी मूल प्रक्रति से जुदा रहता है और अपने शोषण में बेमन से सम्मिलित हो जाता है। मैं यह नहीं कह रहा कि किसी दूसरे का जीवन किसान या मज़दूर के जीवन से बेहतर है। पर मैं यह ज़रूर कह रहा हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास इतनी स्वतंत्रता तो होनी चाहिए की वह जीवन को परख कर अपने अनुसार एक उत्कृष्ट जीवन जी सके।
पर अधिकतर मनुष्यों के पास जीवन को परखने के लिए या तो समय नहीं है या साधन नहीं हैं। समय आर्थिक ग़ुलामी के कारण नहीं है और साधन न के बराबर या अधूरी शिक्षा के कारण नहीं है। जब कोई व्यक्ति कोई व्यवसाय बस इसलिए करता है कि वह जीवन के लिए ज़रूरी साधन जुटा सके, चाहे वह व्यवसाय उसकी आत्मा को तृप्त न करे तो यह आर्थिक ग़ुलामी का संकेत है। इसका कारण सिर्फ़ कौशल की कमी या शिक्षा की कमी नहीं है। बहुत से कुशल और शिक्षित व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध सिर्फ़ वेतन के लिए काम करते हैं।
इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था जीवन को परखने के साधन व्यक्तियों को उपलब्ध नहीं कराती। शिक्षा ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करती है जो आदेश के अनुसार काम करने में कुशल हो। चाहे आदेश निजी हों या सार्वजनिक। शिक्षा आलोचनात्मक विचार करने लायक़ युवक-युवतियाँ तैयार ही नहीं करती। ऐसे में जीवन की परख कर सकने वाले व्यक्ति कैसे तैयार हो पाएँगे? और बिना जीवन की परख के व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी कैसे समझेगा? बिना इस समझ के व्यक्ति अपाहिज और जीवन के आनंद से भी बहुत दूर हो जाता है।
बिना जीवन की समझ और ज़िम्मेदारियों के निर्वाहन के व्यक्ति सम्मज में तो अन्याय को बढ़ावा देता ही है, अपने साथ भी अन्याय ही करता है। एक ही जीवन है उसे अन्याय में लगाकर, गम्भीरता से भागकर क्या लाभ होगा? एक ज़िम्मेदार जीवन असल प्रार्थना है। हमारे कर्म (चाहे वह जड़ता से उत्पन्न हो या बुद्धि से) का प्रभाव अन्य व्यक्ति या समाज पर कैसा होगा इतनी चिंता तो हमें करनी ही चाहिए। यदि हम ऐसा न कर पाए तो जल्दी ही हम अपने जीवन को निरर्थक समझने लगेंगे। और निरर्थकता से अवसाद ज़्यादा दूर नहीं होता।